बुधवार, 4 नवंबर 2009

दो दिवसीय वैज्ञानिक कार्यषाला


पर्वतीय क्षेत्र के औद्योगिक एवं पर्यावरण संरक्षण पर दो दिवसीय वैज्ञानिक कार्यषाला
राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप स्थापित हो लघु औद्योगिक इकाईयां: डाॅ निषंक
देहरादून, 04 नवम्बर, मुख्यमंत्री डाॅ. रमेष पोखरियाल निषंक ने वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून में ‘पर्वतीय क्षेत्र के औद्योगिक एवं पर्यावरण संरक्षण’ पर आयोजित दो दिवसीय कार्यषाला का षुभारम्भ करते हुए कहा कि उत्तराखण्ड की परिस्थितियांे को देखते हुए यहां की पृष्ठभूमि के अनुरूप उद्योग से जुड़ी संभावनाओं को तलाष जाय। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में ठोस कार्ययोजना के तहत लघु औद्योगिक इकाइयां स्थापित करने की आवष्यकता है। जिससे युवाओं का पलायन रोका जा सके। लद्यु औद्योगिक इकाइयां यहां के औद्योगिक, आर्थिक एवं सामाजिक दिषा में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा। मुख्यमंत्री डाॅ. निषंक ने कहा कि कार्यषाला प्रदेष की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप विकास को प्रोत्साहन देने के लिए महत्वपूर्ण होगी। उन्होंने वैज्ञानिकों से अपील की, कि यहां के भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप कम समय और कम श्रम में स्थानीय उत्पाद पर आधारित रोजगार के अधिकाधिक अवसर सृजन करने वाली ग्रामीण उद्योगों का चिन्हीकरण करायें, ताकि यहां के लोगों में उद्यमिता विकास की भावना पैदा हो और युवाओं के पलायन को रोकने में सक्षम हो। उन्होंने कहा कि पलायन से हम पर दोहरा संकट आने की संभावना है। उन्होंने कहा कि दो अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं से लगे उत्तराखण्ड के युवाओं का पलायन रोकना आवष्यक है। लघु उद्योगों के विकास से जहां पलायन पर नियंत्रण होगा, वहीं समन्वित एवं सुनियोजित विकास से उत्तराखण्डवासियों की सामाजिक, औद्योगिक व आर्थिक प्रगति होगी। इसके लिए उन्होंने वैज्ञानिकों से आधुनिकतम एवं परिष्कृत औद्योगिकी यहां के परिपे्रक्ष्य में संस्तुति करने की अपेक्षा की। डाॅ. निषंक कहा कि हिमालयी राज्य होने के कारण यहां पर होने वाले प्रभाव देष को प्रभावित करता है। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड की जवानी और पानी राष्ट्र को समर्पित हैं, यहां के युवा सेना में रहकर देष की रक्षा में अपना अभूतपूर्व योगदान दे रहे है तथा 65 प्रतिषत भू-भाग वन क्षेत्र होने के कारण यहां के लोगों का पर्यावरण सुरक्षा में भी महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप विकास की चिंता करने की वैज्ञानिकों से अपील की। उन्होंने कहा कि प्रदेष को आदर्ष राज्य बनाने लिए ही उत्तराखण्ड राज्य का गठन हुआ है। यहां पर जड़ी बूटियों की अपार संभावनाएं है, किन्तु उसके वैज्ञानिक कृषिकरण एवं विपणन के अभाव में इसका समुचित उपयोग नही हो पा रहा है। इस क्षेत्र में भी वैज्ञानिकों से सुझाव आमंत्रित किये। उन्होंने कहा कि देवभूमि उत्तराखण्ड भारतीय संस्कृति का प्राण है और यहां उपलब्ध संसाधनों एवं जैव विविधता को मध्यनजर रखते हुए उसके अनुरूप तकनीकी प्रयोग में लानी होगी। उन्होंने कहा कि यहां साहसिक, जल क्रीड़ा, की असीम संभावनाएं है तथा पर्यावरण संतुलन वाली औद्योगिक इकाईयां स्थापित करने की आवष्यकता है। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप लघु औद्योगिक इकाईयों की स्थापना से ऐसा वातावरण बने जो, प्रभावी संदेष के रूप में पूरे देष में फैले। उन्होंने हिन्दी साहित्य विज्ञान परिषद द्वारा वैज्ञानिक अनुसंधानों एवं षोधों को हिन्दी पत्रकारिता के माध्यम से प्रचार-प्रसार करने के लिए हिन्दी विज्ञान साहित्य परिषद द्वारा किये जा रहे प्रयासों की सराहना की। मुख्यमंत्री द्वारा गजानन काले एवं रामप्रसाद द्वारा लिखित ‘पदार्थ अभिलक्षणन की प्रगत विधियां’ पुस्तक का विमोचन किया। उन्होंने वैज्ञानिक शोधों के हिन्दी भाषा के माध्यम से प्रचार-प्रसार करने वाली गतिविधियों की सराहना की। इस अवसर पर भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र, मुम्बई द्वारा संचालित हिन्दी भाषा की विज्ञान गोष्ठियों एवं साहित्य के प्रकाषन की प्रषंसा की। प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार भारत सरकार डाॅ. आर. चिदम्बरम ने कहा कि परिषद का निरंतर प्रयास रहा है, कि विज्ञान को हिन्दी में साहित्य के रूप में आमजन तक पहुंचाया जाय। उन्होंने कहा कि पहाड़ों में ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योगों के विकास की बहुत आवष्यकता है। उन्होंने कहा कि औद्योगिक विकास के लिए ऊर्जा की आवष्यकता है, जिसके लिए उन्होंने अन्य स्रोतों से ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने की आवष्यकता पर बल दिया। उन्होंने नाभिकीय ऊर्जा एवं घराट निर्माण, जैसे विकल्पों से ऊर्जा उत्पादन की आवष्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि हमारे वैज्ञानिक ग्रामीण क्षेत्र के उद्योगों के लिए नई तकनीकी विकसित कर रहे है, जिससे ग्रामीण उद्योगों को आधुनिकता प्रदान कर ग्रामीण जीवन स्तर को उठाने में मदद मिलेगी। इस अवसर पर महानिदेषक आई.सी.एफ.आर.आई. डाॅ. जी.एस.रावत, निदेषक वन अनुसंधान संस्थान डाॅ.एस.एस.नेगी, निदेषक यूकाॅस्ट डाॅ. राजेन्द्र डोभाल, निदेषक जैव चिकित्सा डाॅ. कृष्णा वी.सैनिष, हेस्को संस्थापक डाॅ. अनिल जोषी ने भी हिन्दी विज्ञान परिषद के विज्ञान को आम जन की भाषा के रूप में प्रस्तुत करने के प्रयासों की सराहना की। कार्यषाला के तकनीकी सत्र में अपर निदेषक उद्योग सुधीर चन्द्र नौटियाल तथा सी.आई.आई के प्रतिनिधि राकेष ओबराॅय ने भी पर्वतीय क्षेत्रों में उद्योग की संभावनाओं पर विस्तृत प्रकाष डाला।

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2009

हिमालयी राज्यों क सम्मेलन


पर्वतीय विकास मंत्रालय का गठन हो: निषंक
देहरादून 30 अक्टूबर
हिमालयी राज्यों के सर्वांगीण विकास के लिए अलग से केन्द्रीय पर्वतीय विकास मंत्रालय का गठन किया जाय। जिसमें पृथक नियोजन नीति एवं बजट का प्राविधान भी हो। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री डाॅ. रमेष पोखरियाल ‘‘निषंक‘‘ ने षिमला में आयोजित हिमनद, जलवायु परिवर्तन, जीविकोपार्जन पर हिमालयी राज्यों के सम्मेलन के अवसर पर यह बात कही। उन्होंने कहा कि हिमालयी राज्यों के लिए एक पृथक वन एवं कृषि नीति की आवष्यकता है। डा. निषंक ने मुख्यमंत्री डा. निषंक ने कहा कि उत्तराखण्ड की वन सम्पदा, जल सम्पदा एवं पर्यावरणीय सम्पदा पूरे देष एवं विष्व के लिए है। जिसके लिए केन्द्र सरकार को राज्य को इनके संरक्षण-संवर्द्धन के लिए आर्थिक प्रतिपूर्ति करनी चाहिए। उत्तराखण्ड के वन पूरे देष एवं दुनिया को प्राण वायु आक्सीजन प्रदान करते हैं और केन्द्र सरकार उत्तराखण्ड को प्रतिवर्ष 10 हजार करोड़ रूपये की प्रतिपूर्ति करे। उत्तराखण्ड में हिमालय के अनुकूल ईको-टूरिज्म, आयुर्वेद योग टूरिज्म एवं लघु खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को प्रोत्साहित किया जा रहा है। जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव हमारी अमूल्य जड़ी-बूटियों पर भी पड़ रहा है। केन्द्रीय वन अधिनियम के अनुपालन में पर्वतीय क्षेत्र की जनता अपने सामान्य सड़क-बिजली-पानी के अधिकारों से भी वंचित हो जाती है। विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं मैदान को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं, जो पहाड़ों पर अव्यवहारिक होती हैं। डा. निषंक ने कहा कि उत्तराखण्ड, हिमाचल व अन्य हिमालयी राज्य भी इससे अछूते नहीं है। जलवायु परिवर्तन व पर्यावरण संरक्षण की चुनौतियों ने सर्वाधिक हमारे परिवेश पर प्रभाव डाला है। उन्होंने कहा कि हिमालय प्रभावित होगा तो पूरा देश प्रभावित होगा। उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्र भारत वर्ष की एक बड़ी आबादी का जीवन श्रोत है। मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखण्ड के वन दस हजार करोड़ रूपये से अधिक मूल्य की आक्सीजन देश को देते हैं। उन्होंने मांग की कि देश की आर्थिक खुशहाली व प्रगति के लिए हिमालयी क्षेत्रों में पर्यावरण व पारिस्थिकी संतुलन बनाए रखने के लिए केन्द्र सरकार को अलग से नीति बनानी चाहिए। मुख्यमंत्री डा. निशंक ने यह भी बताया कि ग्लेशियर तथा उनसे निकलने वाली नदियां समूचे उत्तर भारत में पानी का प्रमुख श्रोत हैं और इनके प्रभावित होने का अर्थ पानी की गम्भीर समस्या का उत्पन्न होना है। उन्होंने ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने पर चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा कि सम्पूर्ण हिमालयी क्षेत्र में 9000 से अधिक ग्लेशियरों में से 1439 ग्लेशियर उत्तराखण्ड में हैं, जिनसे बड़ी मात्रा में 500 घन किमी. ताजा जल संचित होता है। मुख्यमंत्री डा. निशंक ने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग का हिमनदों पर प्रभाव व जलवायु परिवर्तन ऐसी समस्या है जिसका समाधान ढूंढने के लिए और अधिक प्रयास किए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि आधुनिक जीवन शैली में परिवर्तन, ग्रीन-हाउस गैसांे के उत्सर्जन को कम, वनों को बढ़ाकर ही हम ग्लोबल वार्मिंग को रोक सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इन समाधानों का हिमालयी क्षेत्र की जनता की प्रगति-उन्नति पर प्रभाव न पड़े यह भी हमें ध्यान में रखना होगा। उन्होंने कहा कि अधिक वनाच्छादित क्षेत्र वाले राज्य में जनता को जंगल से दूर करके कोई नीति कारगर नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड अपनी वन भूमि से केवल चुगान भी करे तो वह सालाना लगभग डेढ़ हजार करोड़ से दो हजार करोड़ की आय कर सकता है। मुख्यमंत्री ने पिछले वर्षों में तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तन और हिमालयी राज्यों में उसके फलस्वरूप उत्पन्न चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा भी की।

रविवार, 25 अक्टूबर 2009

माइग्रेन की वजह से दिमाग की बनावट में बदलाव

माइग्रेन की वजह से दिमाग की बनावट में बदलाव
देहरादून 25 अक्टूबर
माइग्रेन से पीड़ित व्यक्ति की दिमागी संरचना अन्य लोगों से थोड़ी अलग होती है। यह अंतर खासतौर पर दिमाग के कॉर्टेक्स क्षेत्र में होता है। अमेरिकी शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन के बाद यह जानकारी दी है।


हालाँकि शोध में यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि इस अंतर की वजह से किसी को माइग्रेन की बीमारी होती है या फिर माइग्रेन की वजह से दिमाग की बनावट में बदलाव आता है।

शोधकर्ता टीम ने ऐसे 24 लोगों की ब्रेन स्कैनिंग की, जो लंबे समय से माइग्रेन से जूझ रहे थे। उनके साथ ही 12 स्वस्थ लोगों के ब्रेन की स्कैनिंग की गई। उन्होंने पाया कि माइग्रेन पीड़ितों का कार्टेक्स यानी दिमाग का वह हिस्सा जो दर्द, स्पर्श या तापमान जैसी संवेदनाओं को महसूस करता है, अन्य लोगों की तुलना में 21 फीसदी मोटा होता है।

शोध का नेतृत्व करने वाली मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल की डॉ. नौशील हैदजीखनी ने बताया कि सबसे ज्यादा अंतर सिर और चेहरे से जुड़ी सेंसरी इंफॉर्मेशन की प्रोसेसिंग के लिए जिम्मेदार कार्टेक्स के हिस्से में देखने को मिला। उन्होंने कहा कि अध्ययन से माइग्रेन की गंभीरता भी सामने आई है। इस बीमारी को हल्के ढंग से नहीं लेना चाहिए, क्योंकि यह दिमाग में बदलाव ला सकती है।

डॉ. नौशीन कहती हैं कि एक संभावना यह हो सकती है कि कार्टेक्स जैसे दिमाग के सेंसरी फील्ड में लंबे समय तक बार-बार उत्तेजना या उकसाव से वह मोटा होने लगता है। दूसरी संभावना यह हो सकती है कि जिन लोगों का कार्टेक्स मोटा होता है उन्हें आगे चलकर माइग्रेन का सामना करना पड़ता हो।

यह है माइग्रेन : माइग्रेन एक प्रकार का सिरदर्द है, जो आधे सिर में होता है। इसके साथ उल्टी होने की शिकायतें भी होती है। महिलाओं में यह बीमारी पुरुषों की तुलना में तीन गुना ज्यादा होती है।

कई लोगों में यह बीमारी आनुवांशिक होती है। डॉ. नौशीन कहती हैं कि हम माइग्रेन के कारणों को जितना ज्यादा समझ सकेंगी, इसके इलाज के लिए उतनी ही प्रभावी दवाइयाँ बनाई जा सकेंगी।

ग्लोबल वॉर्मिंग की पहली ऑफिशल विस्थापित कम्युनिटी

देहरादून 25 अक्टूबर
पापुआ न्यू गिनी दुनिया
के नक्शे से जल्दी ही गायब हो जायेगा। क्योकि इस छोटे से मुल्क में कुछ ऐसा हो रहा है, जो
हम सबके लिए खतरे की बड़ी घंटी है। जिसे हमने अब भी नहीं सुना तो शायद बहुत देर हो जाएगी।

ऑस्ट्रेलिया के पास मौजूद इस देश का एक पूरा द्वीप डूबने वाला है। कार्टरेट्स नाम के इस आइलैंड की पूरी आबादी दुनिया में ऐसा पहला समुदाय बन गई है जिसे ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से अपना घर छोड़ना पड़ रहा है - यानी ग्लोबल वॉर्मिंग की पहली ऑफिशल विस्थापित कम्युनिटी। जिस टापू पर ये लोग रहते हैं वह 2015 तक पूरी तरह से समुद्र के आगोश में समा जाएगा

उत्तराखण्ड में 400 साल पुराना महावृक्ष

उत्तराखण्ड में 400 साल पुराना महावृक्ष
देहरादून 25 अक्टूबर एशिया में चीड़ एवं देवदार प्रजाति के वृक्षों में उत्तराखंड के जंगलों का दबदबा रहा है। इसके साथ ही मोटाई में एशिया में दूसरे नंबर का देवदार वृक्ष भी चकराता वन प्रभाग की कनासर रेंज में ही है। उत्तरकाशी के टौंस वन प्रभाग अंतर्गत कोठिगाड़ रेंज के बालचा वन क्षेत्र जनपद देहरादून की सीमांत तहसील त्यूणी से सटा हुआ है। देवदार के इस महावृक्ष की मोटाई (गोलाई) 8.25 मीटर और ऊंचाई 48 मीटर है। इस वृक्ष की आयु 400 साल से अधिक बताई जाती है। वर्ष 1994 में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भारत सरकार द्वारा इसे महावृक्ष के रूप में पुरस्कृत किया गया था। भारतीय वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई) के म्यूजियम में देवदार वृक्ष की जो सबसे अधिक गोलाई की अनुप्रस्थ काट प्रदर्शित की गई है, वह वृत भी इसी खंड में स्थित थी, जिसके अवशेष अब भी मौजूद हैं। देहरादून जिले के चकराता वन प्रभाग अंतर्गत कनासर रेंज में स्थित देवदार का एक और वृक्ष महावृक्ष बनने की होड़ में अपना आकार फैला रहा है। चकराता-त्यूणी मोटर मार्ग पर कोटी-कनासर वन खंड में स्थित इस देवदार वृक्ष की मोटाई (गोलाई) 6.35 मीटर है। इस वृक्ष की अनुमानित आयु 600 साल से अधिक बताई जाती है। देवदार एवं चीड़ प्रजाति के वृक्षों की चाहे ऊंचाई की बात रही हो या मोटाई की, महावृक्ष का खिताब पाने में पूरे एशिया में उत्तराखंड के जंगलों का ही दबदबा रहा है। एशिया के सबसे ऊंचे चीड़ महावृक्ष में भी उत्तराखंड राज्य के टौंस वन प्रभाग ने अपनी पहचान बनाई।

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2009

हिमालय की संवदेनशीलता से प्रभावित होगी पूरी दुनिया


हिमालय की संवदेनशीलता से प्रभावित होगी पूरी दुनिया
देहरादून 22 अक्टूबर। हिमालय की संवदेनशीलता पूरी दुनिया को प्रभावित करती है, क्योंकि हिमालय पर्यावरण संतुलन, जल संसाधन तथा देश की सुरक्षा का प्रहरी है तथा भूकम्प की दृष्टि से संवदेनशील होने के कारण इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी हम सबकी है। यह बात मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक ने वाडिया इंस्टिट्यूट में भूकम्प का पूर्वानुमान पर आयोजित त्रिदिवसीय कार्यशाला का उद्घाटन करते हुए कही। डा. निशंक ने कहा कि हिमालय की संवेदनशीलता प्रदेश से ही नहीं पूरे विश्व को प्रभावित करती है। इसलिए इसकी सुरक्षा विश्व समुदाय की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि भूकम्प के कारण जनहानि के साथ-साथ अन्य क्षतियां भी होती हैं तथा प्रकृति के असंतुलन से दैवीय आपदाएं जन्म लेती हैं। उन्होंने कार्यशाला में प्रतिभागी वैज्ञानिकों से अपील की, कि इस कार्यशाला में प्रकृति से आत्मीयता एवं उसके वैज्ञानिक दोहन पर गम्भीरता से मंथन किया जाय। उन्होंने कहा कि मंथन में आये बहुमूल्य विचारों को राज्य सरकार अपने नियोजन में शामिल करेगी। मुख्यमंत्री डा. निशंक ने कहा कि भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिकता को अधिक महत्व दिया गया है तथा प्रकृति द्वारा प्रदत्त नैसर्गिक सौंदर्यता ने देश ही नहीं अपितु विदेशियों को भी प्रदेश की ओर आकर्षित किया है। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड में प्रकृति से प्रेम की परम्परा रही है, और यही कारण है कि यहां के विभिन्न त्योहार, पेड़-पौधों, फसल तथा पशुओं की पूजा से जुड़े हुए हैं। वृक्षारोपण, गौ-पूजा जैंसी हमारी परम्परायें प्रकृति के संतुलन के लिए बहुमूल्य है किन्तु आधुनिकता की दौड़ में इन परम्पराओं को लोग नहीं अपना रहे हैं, जिससे भूस्खलन, बादल फटने जैसी अनेक दैवीय आपदायें जन्म लें रही हैं। उन्हांेने कहा है कि अच्छी परम्पराओं का वैज्ञानिक ढंग से प्रचार प्रसार कर प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है, उन्होंने इसके लिए वैज्ञानिकों का आह्वान किया। उन्होंने वैज्ञानिकों को सम्बोधित करते हुए विकास की धुरी बनकर प्रदेश एवं देश के चहुॅमुखी विकास में आगे आयें। उन्होंने वैज्ञानिकों का अभिनन्दन करते हुए शोध कार्यों की सफलता हेतु शुभकामना दी। इस अवसर पर अध्यक्ष विधान सभा हरबंस कपूर ने कहा कि यह सौभाग्य का विषय है, कि विश्व स्तर के इस संस्थान मंे भूकम्प के पूर्वानुमान जैसे विषय को लेकर देश के वैज्ञानिक एक जगह एकत्र हुए हैं। उन्होंने कहा कि भूकम्प नियत्रंण मनुष्य के हाथ में नहीं है, किन्तु इसकी पूर्व सम्भावनाओं को शोध आदि से प्राप्त कर लोगों को इससे सचेत कर नुकसान कम किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र प्राकृतिक आपदाओं से संवेदनशील है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह संस्थान प्रदेश ही नहीं अपितु विश्व समुदाय की सेवा करने में भी सहायक होगा। श्री कपूर ने कहा कि ग्लेशियर का पिघलना पूरे देश की चिन्ता का विषय है तथा इनके सुरक्षित होने से मानव समाज को पर्याप्त मात्रा में पानी की कमी से रूबरू नहीं होना पडे़गा। उन्हांेने कहा कि हमारे प्रदेश के लोग प्राकृतिक सम्पदा के संरक्षण हेतु पूर्व से ही संवेदनशील हैं। प्रदेश का 65 प्रतिशत वन भू-भाग होने के कारण विकास की गति को बनाने के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधन की सुरक्षा करने का हमारा दोहरा दायित्व है। इस कारण कार्यशाला में आये विचार राज्य के परिपे्रक्ष्य में उपयोगी होंगे। उन्होंने राज्य के परिप्रेक्ष्य में भूकम्प पर जानकारी संकलन का आह्वान भी किया। पूर्व सचिव समुद्री विकास भारत सरकार पदमश्री डा. हर्ष के. गुप्ता ने कहा कि भूकम्प की भविष्य वाणी से जन, पशु तथा धनहानि को कम किया जा सकता है। इस महत्वपूर्ण विषय को लेकर यह कार्यशाला मानव समाज के कल्याण के लिए बहुमूल्य होगी। उन्होंने मुख्य अतिथि एवं अध्यक्ष विधान सभा की उपस्थिति को गरिमामय बताते हुए कार्यशाला की सफलता की कामना की। इस अवसर पर वरिष्ठ वैज्ञानिक वाडिया संस्थान ए. के. दुबे ने उपस्थित वैज्ञानिकों का साधूवाद किया। इससे पूर्व वाड़िया इंस्टिट्यूट के निदेशक डा. वी. राज अरोड़ा ने कार्यशाला के उद्देश्य पर विस्तार से प्रकाश डाला। कार्यशाला में मुख्य सचिव इन्दु कुमार पाण्डे, यू-कोस्ट के निदेशक डा. राजेन्द्र डोभाल, यू-सैक के निदेशक एम.एम. किमोठी, निदेशक मौसम विभाग डा. आनन्द शर्मा, पूर्व निदेशक वाड़िया इंस्टिट्यूट डा. वी. सी. ठाकुर, डा. एन. एस. द्विवेदी, डा.एस.सी.डी. शाह सहित अनेक वैज्ञानिक उपस्थित थे।