रविवार, 29 नवंबर 2009

जगदीश चंद्र बोस के 152वें जन्मदिन पर भावपूर्ण स्मरण

देहरादून 29 नवम्बर। जगदीश चंद्र बोस का जन्म 30 नवम्बर 1858 में ढाका जिले के फरीदपुर के माइमसिंह गांव में हुआ था, जो कि अब बंग्लादेश का हिस्सा है। ग्यारह वर्ष की आयु तक श्री बोस ने गांव के ही एक विद्यालय में शिक्षा ग्रहण की। बाद में ये कलकत्ता आ गये और सेंट जेवियर स्कूल में प्रवेश लिया। जगदीश चंद्र बोस की जीव विज्ञान में बहुत रुचि थी, फिर भी भौतिकी के एक विख्यात प्रो. फादर लाफोण्ट ने बोस को भौतिक शास्त्र के अध्ययन के लिए प्रेरित किया। भौतिक शास्त्र में बी. ए. की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 22 वर्षीय बोस चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई करने के लिए लंदन चले गए। मगर स्वास्थ खराब रहने की वजह से इन्होने चिकित्सक (डॉक्टर) बनने का विचार त्यागकर कैम्ब्रिज के क्राइस्ट महाविद्यालय से बी. ए. की डिग्री प्राप्त की। वर्ष 1885 में ये स्वदेश लौटे तथा भौतिकी के सहायक प्राध्यापक के रूप में प्रेसिडेंसी कॉलेज में पढ़ाने लगे। यहां वह 1915 तक रहे। उस समय भारतीय शिक्षकों को अंग्रेज शिक्षकों की तुलना में एक तिहाई वेतन दिया जाता था। इसका जगदीश चंद्र बोस ने विरोध किया और बिना वेतन के तीन वर्षों तक काम करते रहे, जिसकी वजह से उनकी पारिवारिक हालत खराब हो गई और उन पर काफी कर्जा हो गया था। इस कर्ज को चुकाने के लिये उन्हें अपनी पुश्तैनी जमीन भी बेचनी पड़ी। चैथे वर्ष जगदीश चंद्र बोस की जीत हुई और उन्हें पूरा वेतन दिया गया। बोस एक अच्छे शिक्षक भी थे, जो कक्षा में पढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक प्रदर्शनों का उपयोग करते थे। बोस के ही कुछ छात्र जैसे सतेन्द्र नाथ बोस आगे चलकर प्रसिद्ध भौतिक शास्त्री बने। जगदीश चंद्र बोस ने सूक्ष्म तरंगों (माइक्रोवेव) के क्षेत्र में वैज्ञानिक कार्य तथा अपवर्तन, विवर्तन एवं धुव्रीकरण के क्षेत्र में अपने प्रयोग भी प्रारंभ कर दिये थे। लघु तरंगदैर्ध्य, रेडियो तरंगों तथा श्वेत एवं पराबैगनी प्रकाश दोनों के रिसीवर में गेलेना क्रिस्टल का प्रयोग बोस के द्वारा ही विकसित किया गया था। मारकोनी के प्रदर्शन से 2 वर्ष पहले ही 1885 में बोस ने रेडियो तरंगों द्वारा बेतार संचार का प्रदर्शन किया था। इस प्रदर्शन में जगदीश चंद्र बोस ने दूर से एक घण्टी बजाई और बारूद में विस्फोट कराया था। आजकल प्रचलित बहुत सारे माइक्रोवेव उपकरण जैसे वेव गाईड, धवक, परावैद्युत लैंस, विद्युतचुम्बकीय विकिरण के लिये अर्धचालक संसूचक, इन सभी उपकरणों का उन्नींसवी सदी के अंतिम दशक में बोस ने अविष्कार किया और उपयोग किया था। बोस ने ही सूर्य से आने वाले विद्युतचुम्बकीय विकिरण के अस्तित्व का सुझाव दिया था जिसकी पुष्टि 1944 में हुई। इसके बाद बोस ने, किसी घटना पर पौधों की प्रतिक्रिया पर अपना ध्यान केंद्रित कर दिया। बोस ने दिखाया कि यांत्रिक, ताप, विद्युत तथा रासायनिक जैसी विभिन्न प्रकार की उत्तेजनाओं में सब्जियों के ऊतक भी प्राणियों के समान विद्युतीय संकेत उत्पन्न करते हैं। 1917 में जगदीश चंद्र बोस को नाइट (खहिगहत) की उपाधि प्रदान की गई तथा शीघ्र ही भौतिक तथा जीव विज्ञान के लिए रॉयल सोसायटी लंदन के फैलो चुन लिए गए। बोस ने अपना पूरा शोधकार्य बिना किसी अच्छे (महंगे) उपकरण और प्रयोगशाला के किया था इसलिये जगदीश चंद्र बोस एक अच्छी प्रयोगशाला बनाने की सोच रहे थे। बोस इंस्टीट्यूट (बोस विज्ञान मंदिर) इसी सोच का परिणाम है जोकि विज्ञान में शोधकार्य के लिए राष्ट्र का एक प्रसिद्ध केन्द्र है।

गुरुवार, 26 नवंबर 2009

Toxics Link की क्षेत्रीय कार्यशाला का आयोजन

राज्य के बायोमेडिकल अपषिष्ट प्रबंधन में Toxics Link करेगा मदद
देहरादून 27 नवम्बर। दिल्ली की एक एनजीओ Toxics Link ने देहरादून में हेल्थ केयर को Toxics Link मुक्त करने की दिशा में पहल विषयक क्षेत्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस परिचर्चा में निष्कर्ष निकला कि उत्तराखण्ड में चिकित्सा स्वास्थ्य क्षेत्र में कार्यरत एक तिहाई संस्थाएं बायोमेडिकल अपशिष्ट प्रबंधन एक्ट 1998 के तहत कार्य नही कर रही है, इससे चिकित्सा स्वास्थ्य के क्षेत्र में कचरे प्रबंधन के लिए ठोस प्रयास होने चाहिए। कार्यशाला में राज्य के चिकित्सा क्षेत्र में कार्यरत विभिन्न लोगों ने प्रतिभाग किया। जिसमे निदेशक चिकित्सा स्वास्थ्य डाॅ. एच.सी.भट्ट ने कहा कि राज्य सरकार अपशिष्ट प्रबंधन के लिए एकीकृत व्यवस्था शुरू करने पर विचार कर रही है, साथ ही दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में सामुदायिक आधारित कचरा प्रबंधन पर विचार कर रही है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को इस कार्य में Toxics Link जैसी संस्थाओं को मदद करनी चाहिए।
Toxics Link के एसोसियेट निदेशक सतीश सिन्हा ने बताया कि यह कार्यशाला काफी महत्वपूर्ण रही है और इसमें कई महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर चर्चा हुई है। उन्होंने बताया कि यह कार्यशाला दो सत्रों में चली, जिसमें बायोमेडिकल अपशिष्ट प्रबंधन तथा चिकित्सा स्वास्थ्य क्षेत्र में मरकरी के अधिक उपयोग पर चर्चा की गई। श्री सिन्हा ने बताया कि कार्यशाला में आये सुझावों को शामिल कर बायोमेडिकल अपशिष्ट प्रबंधन के लिए नीति तैयार की जायेगी।
कार्यशाला मेंToxics Link के वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी मो. तारिख, सुश्री रागिनी कुमारी तथा विनोद आदि उपस्थित थे।

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

समुद्र से बुझेगी प्यास

समुद्र से बुझेगी प्यास देहरादून 17 नवम्बर। विज्ञान के क्षेत्र में हर दिन नई खोज और नई चुनौतियां सामने आ रही है। आज पूरी दुनिया पीने के पानी के लिए चिंतित है कि भविष्य में कैसे पानी के अधिक स्रोत बढाये जाय। इसी दिशा में मुम्बई स्थित भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र से नया प्रयोग होने जा रहा है। यहां परमाण ऊर्जा के उपयोग में आने वाला समुद्र का खारा पानी मुम्बईवासियों को पीने के लिए मिल पायेगा। इसके लिए परमाण अनुसंधान केन्द्र से पहल शुरू हो गई। अभी तक समुद्र के खारे पानी को परमाणु ऊर्जा बनाने के लिए होता था। अब अगर इस पानी का उपयोग पीने के लिए भी होगा तो इससे पानी की समस्या काफी हद तक हल हो जायेगी। साथ समुद्र के खारे पानी को वैज्ञानिक विधि से परिवर्तित कर पीने योग्य बनाया जाय, तो इससे मुम्बई जैसे शहरों की समस्या हल हो जायेगी। लेकिन इस प्रकार तैयार होने वाले पीने के पानी की कीमत पर भी सोचना होगा, क्योंकि इसकी कीमती शायद अभी तक मिलने वाले पानी से अधिक होगी।

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

किसानों के लिए लाभदायक बने कृषि - डा. पं

किसानों के लिए लाभदायक बने कृषि - डा. पंत विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी कांग्रेस सम्पन्न
पंतनगर। 12 नवम्बर, 2009। तीन-दिवसीय राज्य स्तरीय उत्तराखण्ड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी कांग्रेस का आज समापन हुआ। गांधी हाल में अपराह्न से आयोजित समापन समारोह के मुख्य अतिथि दून विश्वविद्यालय के कुलपति डा. गिरजेश पंत थे जबकि समारोह की अध्यक्षता पंतनगर विश्वविद्यालय के कुलपति डा. बी.एस. बिष्ट ने की। इस अवसर पर कृषि धन के निदेशक, डा. जी.के. गर्ग, भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के पूर्व सलाहकार श्री आर. शाह तथा उत्तराखण्ड काउंसिल आॅफ सांइस एण्ड टैक्नोलाॅजी के निदेशक, डा. राजेन्द्र डोभाल जी मंचासीन थे। डा. गिरजेश पंत ने अपने विचारोत्तेजक सम्बोधन में कहा कि कृषि को वास्तव में उत्पादक बनाने हेतु तथा किसानों के लिए लाभदायक बनाने हेतु सरकार की सहायता आवश्यक है तभी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी किसानों की हितार्थ बन पायेगी। डा. पंत ने कहा कि प्रथम हरित क्रांति के समय सरकार को यह भान था कि खाद्यान्न में आत्म निर्भर हुए बिना देश की आजादी को बनाये रखना मुश्किल होगा। इस लिए कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकारी मशीनरी का पूरा सहयोग रहा। किन्तु अब औद्योगिक क्षेत्र की ओर अधिक ध्यान के कारण कृषि की ओर सरकारी सहयोग कम हुआ है। उन्होंने कहा कि आज की विज्ञान एवं तकनीक कृषि व्यवसायिकों की ओर अधिक केन्द्रित है जिससे किसानों को अधिक लाभ नहीं मिल पा रहा है तथा कृषि उनके लिए आर्थिक रूप से लाभदायक नहीं हो पा रही है। डा. पंत ने सरकारी सर्वे का हवाला देते हुए कहा कि आज 40 प्रतिशत किसान मौका मिलने पर खेती को छोड़ने के लिए तैयार हैं। मुख्य अतिथि ने कहा कि जब तक परिस्थितियों को नहीं बदला जायेगा तब तक दूसरी हरित क्रांति का प्रादुर्भाव होना मुश्किल होगा। कुलपति डा. बी.एस. बिष्ट ने अपने सम्बोधन में कहा कि उत्तराखण्ड के सभी विज्ञान एवं तकनीकी संस्थानों को आपसी सहयोग के साथ नये क्षेत्रों में कार्य करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि विभिन्न क्षेत्रों के वैज्ञानिकों की एक टास्क फोर्स बनाये जाने की आवश्यकता है। जो प्रदेश के विभिन्न नीतियों के निर्माण में अपने ज्ञान का योगदान कर सकें। डा. आर. शाह ने कहा कि यह विज्ञान कांग्रेस अन्य इस प्रकार के सम्मेलनों से अलग है क्योंकि इसमें प्रौद्योगिकी को भी उचित स्थान दिया गया है। उन्होंने विज्ञान द्वारा सामाजिक जरूरतों को पूरा करने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही उन्होंने जलवायु परिवर्तन का समाज व कृषि पर पड़ रहे प्रभाव के अध्ययन की भी आवश्यकता बतायी। समापन समारोह में निदेशक, कृषि धन, जालना के निदेशक, डा. जी.के. गर्ग ने चैथे विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी कांग्रेस को सफल बताते हुए आशा व्यक्त की कि उत्तराखण्ड राज्य में विज्ञान की गुणवत्ता एवं युवा वैज्ञानिकों के उत्साह को देखते हुए राज्य का भविष्य उज्जवल होगा। इस कार्यक्रम मंे देश के विभिन्न संस्थानों से आये हुए वैज्ञानिकों द्वारा कांग्रेस मंे दिये गये शोध प्रस्तुतिकरण के आधार पर कुल 46 वैज्ञानिकों को पुरस्कृत किया गया। कार्यक्रम के प्रारम्भ में उत्तराखण्ड विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के निदेशक, डा. राजेन्द्र डोभाल ने तीन दिनांे तक चले कांग्रेस का विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए इसमंे हुयी प्रमुख संस्तुतियों के बारे में बताया। अधिष्ठाता मानविकी, डा. बी.आर.के. गुप्ता ने कार्यक्रम के प्रारम्भ में सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत किया। कार्यक्रम के अंत में विभागाध्यक्ष, आणविक जीव विज्ञान एवं आनुवांशिक प्रौद्योगिकी एवं कांग्रेस के आयोजन सचिव, डा. अनिल कुमार गुप्ता ने सभी को धन्यवाद ज्ञापित किया।

बुधवार, 11 नवंबर 2009

चतुर्थ राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी कांग्रेस


वैज्ञानिक राज्य के चहुंमुखी विकास में विशेष भूमिका निभायें: राज्यपाल
चतुर्थ राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी कांग्रेस
पंतनगर 10 नवम्बर, 2009 महामहिम राज्यपाल श्रीमती मारग्रेट अल्वा ने मंगलवार को पंतनगर में आयोजितचतुर्थ राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी कांग्रेस का उद्घाटन करने के पश्चात कहा कि उत्तराखण्ड राज्य के युवा वैज्ञानिकों राज्य के विकास में आगे आये। राज्य को जैविक विविधताओं का केन्द्र बताते हुए उन्होंने प्रदेश में कृषि विकास के लिए ठोस कार्ययोजना तैयार करने पर बल दिया। उन्होंने वर्तमान समय में खाद्यान्न व पर्यावरण सुरक्षा को गंभीर मुद्दा बताते हुए विभिन्न विभागों को एकजुट होकर कारगर योजनाओं पर कार्य करने पर जोर दिया। उन्होंने इस दिशा में उत्तराखण्ड विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (यूकोस्ट) के प्रयासों की सराहना करते हुए वैज्ञानिकों से प्रदेश के चहुंमुखी विकास में विशेष भूमिका निभाने की अपेक्षा की। राज्यपाल ने देश में हरित क्रांति लाने में विशेष भूमिका निभाने वाले पंत विवि के वैज्ञानिकों से भी दूसरी हरित क्रांति का ध्वजवाहक बनने तथा श्वेत क्रांति, पीली क्रांति व नीली क्रांति के क्षेत्र में भी कीर्तिमान स्थापित करने की अपेक्षा की। उन्होंने राज्य में प्रसंस्करण इकाइयों के विस्तार पर भी बल दिया। इसके साथ ही उन्होंने स्पेशल इकोनोमिक जोन के तहत उपजाऊ भूमि के उपयोग पर चिंता व्यक्त करते हुए इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने की वकालत की। जी.बी.पंत विवि के कुलपति डॉ. बी.सी. बिष्ट ने राज्यपाल श्रीमती अल्वा सहित सभी वैज्ञानिकों का स्वागत किया। उन्होंने यूकोस्ट द्वारा आयोजित इस समारोह को युवा वैज्ञानिकों के प्रोत्साहन व प्रदेश के कृषि क्षेत्र के समग्र विकास का माध्यम बताते हुए राज्यपाल श्रीमती अल्वा का संक्षिप्त जीवन-परिचय प्रस्तुत किया। साथ ही उन्होंने आगामी 17 नवम्बर से शुरू होने वाले विवि के स्थापना दिवस समारोह तथा विवि में संचालित शिक्षण, शोध व प्रसार कार्यक्रमों की जानकारी भी दी। यूकोस्ट के निदेशक डॉ. राजेन्द्र डोभाल ने इस सम्मेलन में प्रस्तुत शोध पत्रों को विकासपरक व समारोह को प्रदेश विकास का माध्यम बताया। वैज्ञानिकों द्वारा लिखित चार पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। कार्यक्रम के अन्त में अधिष्ठाता विज्ञान एवं मानविकी महाविद्यालय डॉ. बी.आर.के. गुप्ता ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।

बुधवार, 4 नवंबर 2009

दो दिवसीय वैज्ञानिक कार्यषाला


पर्वतीय क्षेत्र के औद्योगिक एवं पर्यावरण संरक्षण पर दो दिवसीय वैज्ञानिक कार्यषाला
राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप स्थापित हो लघु औद्योगिक इकाईयां: डाॅ निषंक
देहरादून, 04 नवम्बर, मुख्यमंत्री डाॅ. रमेष पोखरियाल निषंक ने वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून में ‘पर्वतीय क्षेत्र के औद्योगिक एवं पर्यावरण संरक्षण’ पर आयोजित दो दिवसीय कार्यषाला का षुभारम्भ करते हुए कहा कि उत्तराखण्ड की परिस्थितियांे को देखते हुए यहां की पृष्ठभूमि के अनुरूप उद्योग से जुड़ी संभावनाओं को तलाष जाय। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में ठोस कार्ययोजना के तहत लघु औद्योगिक इकाइयां स्थापित करने की आवष्यकता है। जिससे युवाओं का पलायन रोका जा सके। लद्यु औद्योगिक इकाइयां यहां के औद्योगिक, आर्थिक एवं सामाजिक दिषा में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा। मुख्यमंत्री डाॅ. निषंक ने कहा कि कार्यषाला प्रदेष की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप विकास को प्रोत्साहन देने के लिए महत्वपूर्ण होगी। उन्होंने वैज्ञानिकों से अपील की, कि यहां के भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप कम समय और कम श्रम में स्थानीय उत्पाद पर आधारित रोजगार के अधिकाधिक अवसर सृजन करने वाली ग्रामीण उद्योगों का चिन्हीकरण करायें, ताकि यहां के लोगों में उद्यमिता विकास की भावना पैदा हो और युवाओं के पलायन को रोकने में सक्षम हो। उन्होंने कहा कि पलायन से हम पर दोहरा संकट आने की संभावना है। उन्होंने कहा कि दो अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं से लगे उत्तराखण्ड के युवाओं का पलायन रोकना आवष्यक है। लघु उद्योगों के विकास से जहां पलायन पर नियंत्रण होगा, वहीं समन्वित एवं सुनियोजित विकास से उत्तराखण्डवासियों की सामाजिक, औद्योगिक व आर्थिक प्रगति होगी। इसके लिए उन्होंने वैज्ञानिकों से आधुनिकतम एवं परिष्कृत औद्योगिकी यहां के परिपे्रक्ष्य में संस्तुति करने की अपेक्षा की। डाॅ. निषंक कहा कि हिमालयी राज्य होने के कारण यहां पर होने वाले प्रभाव देष को प्रभावित करता है। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड की जवानी और पानी राष्ट्र को समर्पित हैं, यहां के युवा सेना में रहकर देष की रक्षा में अपना अभूतपूर्व योगदान दे रहे है तथा 65 प्रतिषत भू-भाग वन क्षेत्र होने के कारण यहां के लोगों का पर्यावरण सुरक्षा में भी महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप विकास की चिंता करने की वैज्ञानिकों से अपील की। उन्होंने कहा कि प्रदेष को आदर्ष राज्य बनाने लिए ही उत्तराखण्ड राज्य का गठन हुआ है। यहां पर जड़ी बूटियों की अपार संभावनाएं है, किन्तु उसके वैज्ञानिक कृषिकरण एवं विपणन के अभाव में इसका समुचित उपयोग नही हो पा रहा है। इस क्षेत्र में भी वैज्ञानिकों से सुझाव आमंत्रित किये। उन्होंने कहा कि देवभूमि उत्तराखण्ड भारतीय संस्कृति का प्राण है और यहां उपलब्ध संसाधनों एवं जैव विविधता को मध्यनजर रखते हुए उसके अनुरूप तकनीकी प्रयोग में लानी होगी। उन्होंने कहा कि यहां साहसिक, जल क्रीड़ा, की असीम संभावनाएं है तथा पर्यावरण संतुलन वाली औद्योगिक इकाईयां स्थापित करने की आवष्यकता है। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप लघु औद्योगिक इकाईयों की स्थापना से ऐसा वातावरण बने जो, प्रभावी संदेष के रूप में पूरे देष में फैले। उन्होंने हिन्दी साहित्य विज्ञान परिषद द्वारा वैज्ञानिक अनुसंधानों एवं षोधों को हिन्दी पत्रकारिता के माध्यम से प्रचार-प्रसार करने के लिए हिन्दी विज्ञान साहित्य परिषद द्वारा किये जा रहे प्रयासों की सराहना की। मुख्यमंत्री द्वारा गजानन काले एवं रामप्रसाद द्वारा लिखित ‘पदार्थ अभिलक्षणन की प्रगत विधियां’ पुस्तक का विमोचन किया। उन्होंने वैज्ञानिक शोधों के हिन्दी भाषा के माध्यम से प्रचार-प्रसार करने वाली गतिविधियों की सराहना की। इस अवसर पर भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र, मुम्बई द्वारा संचालित हिन्दी भाषा की विज्ञान गोष्ठियों एवं साहित्य के प्रकाषन की प्रषंसा की। प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार भारत सरकार डाॅ. आर. चिदम्बरम ने कहा कि परिषद का निरंतर प्रयास रहा है, कि विज्ञान को हिन्दी में साहित्य के रूप में आमजन तक पहुंचाया जाय। उन्होंने कहा कि पहाड़ों में ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योगों के विकास की बहुत आवष्यकता है। उन्होंने कहा कि औद्योगिक विकास के लिए ऊर्जा की आवष्यकता है, जिसके लिए उन्होंने अन्य स्रोतों से ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने की आवष्यकता पर बल दिया। उन्होंने नाभिकीय ऊर्जा एवं घराट निर्माण, जैसे विकल्पों से ऊर्जा उत्पादन की आवष्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि हमारे वैज्ञानिक ग्रामीण क्षेत्र के उद्योगों के लिए नई तकनीकी विकसित कर रहे है, जिससे ग्रामीण उद्योगों को आधुनिकता प्रदान कर ग्रामीण जीवन स्तर को उठाने में मदद मिलेगी। इस अवसर पर महानिदेषक आई.सी.एफ.आर.आई. डाॅ. जी.एस.रावत, निदेषक वन अनुसंधान संस्थान डाॅ.एस.एस.नेगी, निदेषक यूकाॅस्ट डाॅ. राजेन्द्र डोभाल, निदेषक जैव चिकित्सा डाॅ. कृष्णा वी.सैनिष, हेस्को संस्थापक डाॅ. अनिल जोषी ने भी हिन्दी विज्ञान परिषद के विज्ञान को आम जन की भाषा के रूप में प्रस्तुत करने के प्रयासों की सराहना की। कार्यषाला के तकनीकी सत्र में अपर निदेषक उद्योग सुधीर चन्द्र नौटियाल तथा सी.आई.आई के प्रतिनिधि राकेष ओबराॅय ने भी पर्वतीय क्षेत्रों में उद्योग की संभावनाओं पर विस्तृत प्रकाष डाला।